ब्राह्मी का पौधा हिमालय की तराई में हरिद्वार से लेकर बद्रीनारायण के मार्ग में अधिक मात्रा में पाया जाता है। जो बहुत उत्तम किस्म का होता है। ब्राह्मी पौधे का तना जमीन पर फैलता जाता है। जिसकी गांठों से जड़, पत्तियां, फूल और बाद में फल भी लगते हैं। इसकी पत्तियां स्वाद में कड़वी और काले चिन्हों से मिली हुई होती है। ब्राह्मी के फूल छोटे, सफेद, नीले और गुलाबी रंग के होते हैं। ब्राह्मी के फलों का आकार गोल लम्बाई लिए हुए तथा आगे से नुकीलेदार होता है जिसमें से पीले और छोटे बीज निकलते हैं। ब्राह्मी की जड़ें छोटी और धागे की तरह पतली होती है। इसमें गर्मी के मौसम में फूल लगते हैं।
विभिन्न भाषाओं में नाम :
हिंदी ब्राह्मी
अंग्रेजी बकोपा मोनिएरा
मराठी ब्राह्मी
गुजराती ब्राह्मी
बंगाली ब्राह्मी, शाक, थुलकुडी
फारसी जर्णव
लैटिन सेण्टाला एश्सियाटिका
अंग्रेजी इण्डियन पेनीवर्ट
संस्कृत पोतवंका, सोमवल्ली, महौषधि, दिव्या, सरस्वती, मण्डूकपर्णी, मण्डूकी, शारदा, कपोतबंका
रंग :ब्राह्मी हरे और सफेद रंग का होता है।
स्वाद :यह खाने में फीका होता है।
स्वरूप :ब्राह्मी के पेड़ अधिकतर गंगा नदी के किनारे पाये जाते हैं। ब्राह्मी का पेड़ छत्ते के समान जमीन पर फैला हुआ होता है। ब्राह्मी की एक और प्रजाति होती है। जिसको मंडक पर्णी कहा जाता है। इसकी बेल भी पृथ्वी पर फैलती है। ब्राह्मी के पत्ते छोटे होते हैं। हमारे देश में अधिकतर यही पायी जाती है।
स्वभाव :यह शीतल (ठंडी) होती है।
हानिकारक प्रभाव :ब्राह्मी का अधिक मात्रा में सेवन करने से सिर दर्द, घबराहट, खुजली, चक्कर आनाऔर त्वचा का लाल होना यहां तक की बेहोशीभी हो सकती है। ब्राह्मी दस्तावर (पेट को साफ करने वाला) होता है। अत: सेवन में सावधानी बरतें और मात्रा के अनुसार ही सेवन करें।
उपाय :ब्राह्मी के दुष्प्रभाव को मिटाने के लिए आप सूखे धनिये का प्रयोग कर सकते हैं।
दोषों को दूर करने वाला : दूधऔर वचइसके गुणों को सुरक्षित रखते हैं एवं इसमें व्याप्त दोषों को दूर करते हैं।
तुलना :ब्राह्मी की तुलना मण्डूक परणी से की जा सकती है।
मात्रा :1 से 3 चम्मच ब्राह्मी के पत्तों का रस, ताजी हरी पत्तियां 10 तक सुखाया हुआ बारीक चूर्ण 1 से 2 ग्राम तक, पंचांग (फूल, फल, तना, जड़ और पत्ती) चूर्ण 3 से 5 ग्राम तक और जड़ के चूर्ण का सेवन आधे से 2 ग्राम तक करना चाहिए।
गुण :ब्राह्मी बुद्धि तथा उम्र को बढ़ाता है। यह रसायन के समान होती है। बुखारको खत्म करती है। याददाश्त को बढ़ाती है। सफेद दाग, पीलिया, प्रमेहऔर खून की खराबीको दूर करती है। खांसी, पित्त और सूजनको रोकती है। बैठे हुए गलेको साफ करती है। ब्राह्मी का उपयोग दिल के लिए लाभदायक होता है। यह उन्माद (मानसिक पागलपन)को दूर करता है। सही मात्रा के अनुसार इसका सेवन करने से निर्बुद्ध, महामूर्ख, अज्ञानी भी श्रुतिधर (एक बार सुनकर जन्म भर न भूलने वाला) और त्रिकालदर्शी (भूतकाल, वर्तमान काल और भविष्य को जानने वाला) हो जाता है, व्याकरण को पढ़ने वाले अक्सर इस क्रिया को करते हैं। मण्डूक परनी भी ब्राह्मी के गुणों के समान होती है। ब्राह्मी घृत, ब्राही रसायन, ब्राही पाक, ब्राह्मी तेल, सारस्वतारिष्ट, सारस्वत चूर्ण आदि के रूप में प्रयोग किया जाता है

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